15 साल का वह जीनियस जो ‘अमरता’ की खोज में है: लौरेंट सिमंस और ‘सुपरह्यूमन’ बनाने का मिशन

15 years old, Laurent Simons has already completed a PhD

जब हम ‘अमरता’ या ‘सुपरह्यूमन’ जैसे शब्दों को सुनते हैं, तो हमारा दिमाग तुरंत मार्वल की फिल्मों या किसी भविष्यवादी विज्ञान कथा (Science Fiction) की ओर भागने लगता है। लेकिन क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि यह कल्पना अब शुद्ध विज्ञान की प्रयोगशालाओं में आकार ले रही है? और इससे भी बड़ी बात यह है कि इस पूरी क्रांति का नेतृत्व कोई सत्तर साल का सफेद बालों वाला वैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक 15 साल का किशोर कर रहा है?

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बेल्जियम के अद्भुत प्रतिभाशाली शोधकर्ता लौरेंट सिमंस (Laurent Simons) की। जिस उम्र में अधिकांश किशोर बोर्ड परीक्षाओं के तनाव में होते हैं या गाड़ी चलाना सीखने का सपना देखते हैं, लौरेंट ने क्वांटम फिजिक्स में पीएचडी पूरी कर ली है और अब वे मानव इतिहास के सबसे पुराने दुश्मन—’बुढ़ापे’ (Aging)—को हराने के लिए मैदान में उतर चुके हैं। एक टेक-एथिक्स जर्नलिस्ट के रूप में, मैं इसे केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्वगत मोड़ के रूप में देखता हूँ। आज हम सिमंस की इस जादुई लगने वाली यात्रा, उनके जटिल शोध और उन गहरे नैतिक सवालों की तह तक जाएंगे जो हमारे भविष्य को हमेशा के लिए बदल सकते हैं। 🧬

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2. प्रस्तावना: विज्ञान कथा से वास्तविकता तक

कल्पना कीजिए कि एक बच्चा 8 साल की उम्र में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर लेता है। सुनने में यह किसी ‘वंडर किड’ की कहानी लगती है, लेकिन लौरेंट सिमंस के लिए यह केवल शुरुआत थी। लौरेंट का जीवन आज एक ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है जहाँ ‘संभव’ और ‘असंभव’ के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। उन्होंने एंटवर्प विश्वविद्यालय (University of Antwerp) से क्वांटम फिजिक्स में अपनी पहली पीएचडी मात्र 15 साल की उम्र में पूरी की। उनका वर्तमान शोध म्यूनिख की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में चल रहा है, जो किसी हाई-टेक साइंस-फिक्शन थ्रिलर से कम नहीं लगता।

सिमंस केवल एक डिग्री हासिल करने वाले छात्र नहीं हैं; वे एक विजनरी हैं। उनका लक्ष्य सीधा, स्पष्ट और अविश्वसनीय रूप से साहसी है: बुढ़ापे को एक लाइलाज बीमारी के रूप में परिभाषित करना और उसे जड़ से मिटाना। वे एक ऐसे भविष्य की कल्पना कर रहे हैं जहाँ इंसान का शरीर अपनी जैविक सीमाओं में नहीं बंधा होगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम एक “सुपरह्यूमन” (अति-मानव) बनाने के लिए तैयार हैं? और क्या हमारी यह जर्जर होती पृथ्वी, जो पहले से ही संसाधनों की कमी और जलवायु संकट से कराह रही है, अमर होने वाले इंसानों का बोझ उठा पाएगी? आइए, हम और आप मिलकर इस यात्रा के हर तकनीकी और नैतिक पहलू का विश्लेषण करें।

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3. क्वांटम फिजिक्स से मेडिकल साइंस तक का सफर

लौरेंट सिमंस की शैक्षणिक यात्रा किसी रॉकेट की गति जैसी रही है। उनकी समझ केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे उन जटिल सिद्धांतों को महसूस करते हैं जिन्हें समझने में दिग्गज वैज्ञानिकों को दशकों लग जाते हैं। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा आठ साल की उम्र में खत्म की और उसके बाद भौतिकी (Physics) की दुनिया में ऐसी छलांग लगाई कि पूरी वैज्ञानिक बिरादरी दंग रह गई।

बोस पोलरॉन्स और सुपरफ्लुइड्स: क्या था उनका शोध?

अपनी पहली पीएचडी के दौरान, लौरेंट ने एक ऐसे विषय पर शोध किया जो क्वांटम भौतिकी की रीढ़ माना जाता है: ‘बोस पोलरॉन्स इन सुपरफ्लुइड्स एंड सुपरसॉलिड्स’ (Bose polarons in superfluids and supersolids)

इसे एक सरल रूपक (metaphor) से समझते हैं। कल्पना कीजिए कि एक विशाल, पूरी तरह से शांत और पारदर्शी झील है। इस झील का पानी इतना ठंडा है कि वह ‘सुपरफ्लुइड’ की तरह व्यवहार करता है—यानी उसमें कोई घर्षण (friction) नहीं है। अब सोचिए कि उस शांत पानी में एक छोटा सा कंकड़ (एक एकल कण) गिरता है। लौरेंट ने यह अध्ययन किया कि वह कंकड़ उस ‘क्वांटम वेव’ या विशाल लहर के साथ कैसे व्यवहार करता है। तकनीकी भाषा में, यह शोध ‘बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट’ के भीतर अशुद्धियों के व्यवहार को समझने के बारे में था। यह केवल किताबी ज्ञान नहीं है; यह शोध भविष्य के उन क्वांटम कंप्यूटरों और सेंसरों की नींव रख सकता है जो आज के सुपर कंप्यूटरों से करोड़ों गुना तेज होंगे। अपनी इस यात्रा के दौरान, उन्होंने प्रतिष्ठित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर क्वांटम ऑप्टिक्स में इंटर्नशिप भी की, जहाँ उन्होंने दुनिया के बेहतरीन दिमागों के साथ काम किया।

म्यूनिख में नई पारी: मेडिकल साइंस और AI का मेल

क्वांटम दुनिया की गुत्थियों को सुलझाने के बाद, लौरेंट ने अपनी दूसरी पीएचडी के लिए म्यूनिख की ओर रुख किया है। यहाँ उनका कार्यक्षेत्र पूरी तरह बदल गया है। अब वे ‘इन सिलिको बायोइंजीनियरिंग’ (in silico bioengineering) के माध्यम से चिकित्सा विज्ञान में क्रांति लाने की कोशिश कर रहे हैं।

“इन सिलिको” को आप इस तरह समझ सकते हैं: जैसे हम किसी नई कार का प्रोटोटाइप सड़क पर उतारने से पहले उसे कंप्यूटर सिम्युलेशन में क्रैश-टेस्ट करते हैं, वैसे ही लौरेंट मानव शरीर का एक ‘डिजिटल ट्विन’ (Digital Twin) बना रहे हैं। यह एक ऐसा वर्चुअल लैब है जहाँ वे किसी भी सुई या इंजेक्शन के बिना, हजारों तरह की दवाओं और उपचारों का परीक्षण एक सेकंड में कर सकते हैं। वे उन्नत एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके मानव ऊतकों और बीमारियों का मॉडल तैयार कर रहे हैं ताकि बुढ़ापे को धीमा करने वाली थेरेपी डिजाइन की जा सकें।

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4. “सुपरह्यूमन” बनाने का मिशन: क्या है सिमंस का ब्लूप्रिंट?

लौरेंट सिमंस के इरादे केवल उम्र बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं। वे मानव प्रजाति के अपग्रेड की बात कर रहे हैं। उनके शोध का केंद्र बिंदु यह समझना है कि कैसे हम अपनी जैविक सीमाओं को तकनीक के साथ जोड़कर एक नई ऊंचाई तक ले जा सकते हैं।

“मेरा दीर्घकालिक लक्ष्य है—सुपरह्यूमन बनाना और बुढ़ापे को हराना। मैं चाहता हूँ कि इंसान अपनी मर्जी से यह तय करे कि उसे कब तक जीना है।” — लौरेंट सिमंस

उनका ब्लूप्रिंट पूरी तरह से डेटा और सिमुलेशन पर आधारित है। वे किसी “चमत्कारी दवा” की तलाश नहीं कर रहे, बल्कि वे उन सेलुलर रास्तों (cellular pathways) की मैपिंग कर रहे हैं जो बुढ़ापे का कारण बनते हैं। उनका मानना है कि यदि हम कंप्यूटर पर कोशिका पुनर्जीवन (cell rejuvenation) की प्रक्रिया को सटीक रूप से डिकोड कर सकें, तो हम इंसानी शरीर के ‘सॉफ्टवेयर’ को फिर से प्रोग्राम कर पाएंगे। हालाँकि अभी उनके प्रयोग प्रयोगशालाओं और डेटा सेटों तक सीमित हैं, लेकिन उनका विजन स्पष्ट है: मौत को एक ‘विकल्प’ बनाना।

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5. डेटा विजुअलाइजेशन: अनुसंधान और भविष्य की तकनीक

लौरेंट की अब तक की असाधारण यात्रा को समझने के लिए नीचे दी गई तालिका देखें:

तालिका: लौरेंट सिमंस: शैक्षणिक मील के पत्थर और अनुसंधान क्षेत्र

चरण (Phase)संस्थान (Institution)मुख्य विषय (Focus Area)प्रमुख परिणाम (Key Result)
प्रारंभिक शिक्षाविभिन्न (बेल्जियम/नीदरलैंड)स्कूली पाठ्यक्रम8 वर्ष की आयु में स्नातक (High School)
स्नातक एवं स्नातकोत्तरएंटवर्प विश्वविद्यालयभौतिक विज्ञान (Physics)रिकॉर्ड समय में डिग्रियाँ पूरी कीं
पीएचडी (प्रथम)एंटवर्प विश्वविद्यालयक्वांटम फिजिक्सबोस पोलरॉन्स और सुपरफ्लुइड्स पर शोध
अनुभवमैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूटक्वांटम ऑप्टिक्सभविष्य की कंप्यूटिंग के लिए शोध अनुभव
पीएचडी (द्वितीय/वर्तमान)म्यूनिख रिसर्च लैबमेडिकल साइंस और AIइन सिलिको बायोइंजीनियरिंग और दीर्घायु

मानवीय विश्लेषण

जब हम इस तालिका को देखते हैं, तो हमें एक ‘क्रॉस-डिसिप्लिनरी’ प्रतिमान (paradigm) दिखाई देता है। लौरेंट ने भौतिकी के मूलभूत सिद्धांतों (परमाणुओं की गति) को सीखा और अब वे उसे जैविक प्रणालियों (कोशिकाओं की गति) पर लागू कर रहे हैं। एक टेक-एथिक्स जर्नलिस्ट के रूप में, मैं इसे एक बहुत ही रणनीतिक कदम मानता हूँ। भविष्य के वैज्ञानिक केवल एक विषय के विशेषज्ञ नहीं होंगे; वे गणित, भौतिकी और जीवविज्ञान के संगम पर खड़े होंगे। सिमंस की गति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली वास्तव में प्रतिभा को पहचान पाने में सक्षम है, या हम सिमंस जैसे कई और जीनियसों को ‘औसत’ बनाने की दौड़ में खो रहे हैं? 💡

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6. दीर्घायु (Longevity) अनुसंधान का नया युग

अमरता की खोज अब केवल ऋषियों या दार्शनिकों का सपना नहीं है; यह सिलिकॉन वैली का सबसे नया और सबसे महंगा ‘हथियार’ है।

निजी कंपनियों की भूमिका और निवेश की होड़

Altos Labs और Retro Biosciences जैसी कंपनियाँ आज खरबों डॉलर इस शोध पर खर्च कर रही हैं कि कोशिकाओं को ‘रिप्रोग्राम’ कैसे किया जाए। उनका मानना है कि बुढ़ापा एक ऐसी जैविक त्रुटि है जिसे ठीक किया जा सकता है। जेफ बेजोस जैसे अरबपतियों ने इस क्षेत्र में भारी निवेश किया है। लौरेंट सिमंस जैसे शोधकर्ता इन कंपनियों के लिए वह ‘मस्तिष्क’ हैं जो सैद्धांतिक मॉडल तैयार कर सकते हैं। यह शोध केवल उम्र बढ़ाने के बारे में नहीं है, बल्कि ‘हेल्थ-स्पैन’ (स्वस्थ जीवन अवधि) को बढ़ाने के बारे में है।

क्या बुढ़ापा वाकई एक लाइलाज बीमारी है?

प्रकृति में हमारे पास ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जो हमें प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, ध्रुवीय व्हेल (Bowhead Whale)। शोध बताते हैं कि ये व्हेल 200 से अधिक वर्षों तक जीवित रह सकती हैं। उनके पास एक ऐसा ‘सेलुलर ट्रिक’ (कोशिकीय युक्ति) है जो कैंसर को रोकता है और डीएनए की मरम्मत करता रहता है। हम इंसानों के पास भी वही मूलभूत जैविक संरचना है, लेकिन हम उसका उस तरह से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। सिमंस का शोध इसी ‘गुप्त कोड’ को अनलॉक करने की कोशिश है। वैज्ञानिकों का तर्क है कि यदि हम व्हेल या कुछ विशेष प्रकार के जेलिफ़िश की तरह अपनी कोशिकाओं को नवीनीकृत करना सीख लें, तो 150 या 200 साल का जीवन केवल एक शुरुआत होगी।

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7. पारिस्थितिक चुनौतियां: एक लंबी उम्र का पर्यावरणीय मूल्य

एक विशेषज्ञ के रूप में, यहाँ मेरा ‘एथिक्स अलार्म’ बजने लगता है। क्या होगा अगर सिमंस का मिशन सफल हो जाए? क्या हमारी पृथ्वी इसके लिए तैयार है?

उपभोग और उत्सर्जन: एक जटिल संतुलन

आज दुनिया पहले से ही अधिक जनसंख्या और संसाधनों की कमी से जूझ रही है। अगर औसत आयु 80 से बढ़कर 150 वर्ष हो जाती है, तो पृथ्वी पर एक ही समय में रहने वाले लोगों की संख्या नाटकीय रूप से बढ़ जाएगी। अधिक लोग मतलब अधिक भोजन, अधिक पानी, अधिक ऊर्जा और अधिक कचरा। यदि हम अपनी वर्तमान ‘उपभोग और फेंको’ (consume and discard) वाली संस्कृति को नहीं बदलते, तो दीर्घायु मानव जाति के लिए एक अभिशाप बन सकती है।

क्या हमारा ग्रह लंबी उम्र के लिए तैयार है?

अध्ययन स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि जनसंख्या का आकार सीधे तौर पर कार्बन उत्सर्जन से जुड़ा है। एक व्यक्ति 70 साल के जीवन में जितना कार्बन फुटप्रिंट छोड़ता है, 150 साल के जीवन में वह उसे दोगुना कर देगा। क्या हम अमरता की इस भूख में अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रेगिस्तान छोड़ जाएंगे? सिमंस का सपना व्यक्तिगत रूप से प्रेरणादायक है, लेकिन सामूहिक रूप से यह एक पारिस्थितिक दुःस्वप्न (Ecological Nightmare) भी हो सकता है।

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8. AI की भूख: बिजली और पानी का संकट

लौरेंट जिस तकनीक का उपयोग “सुपरह्यूमन” बनाने के लिए कर रहे हैं, वह खुद पृथ्वी के संसाधनों को बड़ी बेरहमी से चबा रही है। AI को चलाने के लिए भारी मात्रा में डेटा सेंटर और बिजली की आवश्यकता होती है।

तालिका: AI और डेटा सेंटर: ऊर्जा खपत का अनुमान (2024-2030)

वर्षबिजली खपत (TWh)वैश्विक मांग का %मुख्य पर्यावरणीय चिंता
2024415 TWhलगभग 1.5%जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता, पानी की कमी
2027 (अनुमानित)600+ TWh2.2%दुर्लभ खनिजों (Lithium, Cobalt) का खनन
2030 (अनुमानित)830+ TWh3% से अधिककूलिंग के लिए लाखों गैलन पानी की खपत

AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए केवल बिजली ही नहीं, बल्कि डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए करोड़ों गैलन ताजे पानी की जरूरत होती है। साथ ही, इन कंप्यूटरों को बनाने के लिए जिन दुर्लभ खनिजों (Rare Minerals) की जरूरत होती है, उनका खनन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाता है। विडंबना देखिए—हम एक इंसान को अमर बनाने के लिए जिस मशीन का उपयोग कर रहे हैं, वह मशीन खुद उस ग्रह को मार रही है जिस पर उस इंसान को रहना है। 🌍

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9. नैतिकता और शासन: 15 साल का वैज्ञानिक और नैतिक सीमाएं

जब हम “ह्यूमन एन्हांसमेंट” (Human Enhancement) की बात करते हैं, तो हम एक बहुत ही खतरनाक और अनिश्चित क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।

स्वास्थ्य सुधार बनाम प्रदर्शन वृद्धि (The Murky Territory)

नैतिकता की दुनिया में एक बहुत पतली लकीर है। यदि आप किसी अंधे व्यक्ति को दृष्टि देते हैं, तो वह ‘उपचार’ है। लेकिन यदि आप किसी स्वस्थ व्यक्ति की आँखों में ऐसी चिप लगा देते हैं कि वह अंधेरे में भी देख सके या ज़ूम कर सके, तो वह ‘संवर्धन’ (Enhancement) है। सिमंस का लक्ष्य ‘संवर्धन’ की श्रेणी में आता है। क्या हमें प्रकृति के साथ इस तरह की छेड़छाड़ करने की अनुमति मिलनी चाहिए? क्या इससे समाज में ‘डिजिटल और जैविक विभाजन’ (Biological Divide) पैदा नहीं होगा? क्या केवल अमीर लोग ही अमर हो पाएंगे, जबकि गरीब लोग पुरानी बीमारियों से मरते रहेंगे?

एक किशोर शोधकर्ता की जिम्मेदारी और दबाव

लौरेंट सिमंस अभी केवल 15 साल के हैं। हालाँकि उनकी बुद्धि किसी बुजुर्ग वैज्ञानिक से अधिक हो सकती है, लेकिन क्या उनका भावनात्मक विकास उस स्तर पर है जहाँ वे दुनिया की सबसे विवादास्पद चर्चाओं के केंद्र में रह सकें? उन पर मीडिया और वैज्ञानिक जगत का जो भारी दबाव है, वह उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। यूरोपीय विश्वविद्यालयों में मानव विषयों पर शोध के लिए बहुत सख्त नियम हैं, और सिमंस का काम फिलहाल केवल डिजिटल सिमुलेशन तक सीमित है, जो एक अच्छी बात है। लेकिन शासन (Governance) का सवाल यह है कि जब वे वास्तव में प्रयोग करने की स्थिति में होंगे, तो उन्हें कौन नियंत्रित करेगा?

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10. भविष्य की राह: तकनीकी समाधान या सामाजिक बदलाव?

अमरता की इस दौड़ में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक कभी भी सामाजिक समस्याओं का एकमात्र समाधान नहीं हो सकती। यदि लौरेंट सिमंस बुढ़ापे को हराने में सफल हो जाते हैं, तो हमें अपनी पूरी सामाजिक संरचना को बदलना होगा। हमें डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा ताकि हमारे पास रहने के लिए एक स्वस्थ ग्रह बचे।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लंबी उम्र केवल अमीरों का विशेषाधिकार न बनकर रह जाए। संसाधनों का समान वितरण और टिकाऊ विकास ही वह एकमात्र रास्ता है जो सिमंस के ‘सुपरह्यूमन’ को पृथ्वी पर एक सार्थक स्थान दे सकता है। अन्यथा, हम केवल एक “चमकते हुए डिजिटल कब्रिस्तान” में रहने वाले अमर लोग बनकर रह जाएंगे।

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11. निष्कर्ष: एक गर्म होती दुनिया में नए शरीर की कल्पना

लौरेंट सिमंस की कहानी केवल एक जीनियस बच्चे की कहानी नहीं है; यह मानवता के अगले अध्याय का ‘इंट्रो’ है। वे परमाणुओं की सूक्ष्म दुनिया से निकलकर हमारे डीएनए के रहस्यों को सुलझाने की ओर बढ़ रहे हैं। उनका जुनून सराहनीय है और उनकी उपलब्धियाँ ऐतिहासिक हैं।

लेकिन, एक टेक-एथिक्स जर्नलिस्ट के रूप में मेरा निष्कर्ष यह है: हम अमरता की जिस इमारत को बनाना चाहते हैं, उसकी नींव एक बहुत ही नाजुक ग्रह पर रखी गई है। भविष्य की राह तकनीक और नैतिकता के बीच के उस संतुलन में है, जहाँ हम इंसान की उम्र तो बढ़ाएं, लेकिन मानवता और प्रकृति की कीमत पर नहीं।

आपके लिए एक विचारोत्तेजक प्रश्न: यदि आज आपको अमर होने का विकल्प दिया जाए, लेकिन उसकी कीमत यह हो कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी पर जगह कम हो जाएगी, तो क्या आप उस विकल्प को चुनेंगे? क्या एक लंबी उम्र वाकई सार्थक होगी यदि हमारा घर—यह पृथ्वी—ही रहने लायक न बचे? 🌍❓

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12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. लौरेंट सिमंस की वर्तमान उम्र और पीएचडी विषय क्या है? लौरेंट सिमंस वर्तमान में 15 वर्ष के हैं। उन्होंने एंटवर्प विश्वविद्यालय से अपनी पहली पीएचडी क्वांटम फिजिक्स (विशेष रूप से बोस पोलरॉन्स और सुपरफ्लुइड्स) में पूरी की है। वर्तमान में वे म्यूनिख में मेडिकल साइंस और AI पर अपनी दूसरी पीएचडी कर रहे हैं।

2. “इन सिलिको बायोइंजीनियरिंग” का सरल अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कंप्यूटर के भीतर (In Silicon) जैविक प्रयोग करना। सरल शब्दों में, यह मानव शरीर, उसकी कोशिकाओं और बीमारियों का एक “डिजिटल ट्विन” या कंप्यूटर मॉडल बनाकर उन पर दवाओं और उपचारों का परीक्षण करना है, जिससे जीवित मनुष्यों पर जोखिम कम हो जाता है।

3. क्या लौरेंट सिमंस वास्तव में ‘अमरता’ पर काम कर रहे हैं? तकनीकी रूप से, वे बुढ़ापे को धीमा करने और कोशिकाओं के नवीनीकरण (cell rejuvenation) पर शोध कर रहे हैं। उनका घोषित लक्ष्य “सुपरह्यूमन बनाना और बुढ़ापे को हराना” है, जिसे आम भाषा में दीर्घायु या अमरता की खोज कहा जाता है।

4. AI और बुढ़ापे के शोध का पर्यावरण पर क्या बुरा असर पड़ रहा है? AI मॉडल को चलाने वाले डेटा केंद्र भारी मात्रा में ऊर्जा (2024 में 415 TWh) का उपयोग करते हैं और उन्हें ठंडा करने के लिए लाखों गैलन पानी की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया कार्बन उत्सर्जन बढ़ाती है और जल संसाधनों पर दबाव डालती है।

5. मानव संवर्धन (Human Enhancement) और सामान्य चिकित्सा उपचार में क्या अंतर है? चिकित्सा उपचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति को स्वस्थ या ‘सामान्य’ स्थिति में लाना है (जैसे पेसमेकर लगाना)। इसके विपरीत, ‘मानव संवर्धन’ का उद्देश्य सामान्य मानवीय क्षमताओं को बढ़ाना है (जैसे उम्र को 150 साल तक ले जाना या मस्तिष्क की शक्ति को तकनीक से बढ़ाना)। सिमंस का लक्ष्य संवर्धन की श्रेणी में आता है।

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लेखक: विशेषज्ञ हिंदी डिजिटल कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट और टेक-एथिक्स जर्नलिस्ट

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