
1. प्रस्तावना: एक अदृश्य शिकारी की कहानी
कल्पना कीजिए कि उत्तर भारत की झुलसा देने वाली गर्मी है, तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा है, और आप राहत पाने के लिए अपने पास की किसी झील, नदी या आधुनिक स्विमिंग पूल में एक लंबी डुबकी लगाते हैं। पानी की वह ठंडक आपको सुकून देती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसी पानी की एक मासूम सी दिखने वाली बूंद में एक ऐसा शिकारी छिपा हो सकता है जो न केवल अदृश्य है, बल्कि घातक भी है?
यह कोई विज्ञान-कथा (Science Fiction) की डरावनी कहानी नहीं है, बल्कि एक कड़वी और वैज्ञानिक वास्तविकता है। शोधकर्ता अब एक ऐसे सूक्ष्मजीव के बारे में चेतावनी दे रहे हैं जिसे ‘अदृश्य उत्तरजीवी’ (Microscopic Survivor) कहा जा रहा है। ‘फ्री-लिविंग अमीबा’ (Free-living amoebae) के रूप में जाना जाने वाला यह जीव आज हमारे जल संसाधनों के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती बनकर उभरा है।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि ने इन अमीबाओं को एक नया जीवनदान दिया है। जैसे-जैसे हमारे जल निकाय गर्म हो रहे हैं, ये सूक्ष्म जीव उन इलाकों में भी अपने पैर पसार रहे हैं जहाँ पहले इनका अस्तित्व नहीं था। यह लेख न केवल इस खतरे की वैज्ञानिक गहराइयों में जाएगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि कैसे हमारी आधुनिक जल प्रणालियाँ इस सूक्ष्म दुश्मन के सामने घुटने टेक रही हैं। क्या हम अपनी सबसे बुनियादी जरूरत—पानी—की सुरक्षा के प्रति पर्याप्त सजग हैं? आइए, इस अदृश्य दुनिया की परतों को खोलते हैं। 💧⚠️
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2. क्या है यह नया वैश्विक स्वास्थ्य संकट?
वैज्ञानिक जगत में ‘फ्री-लिविंग अमीबा’ (FLA) को लेकर चिंताएं अचानक नहीं बढ़ी हैं। 25 जनवरी, 2026 को शेनयांग कृषि विश्वविद्यालय (Shenyang Agricultural University) के ‘बायोचार एडिटोरियल ऑफिस’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट ने वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चौकन्ना कर दिया है।
फ्री-लिविंग अमीबा की परिभाषा: ये एकल-कोशिका वाले जीव (Single-celled organisms) हैं जो मिट्टी और पानी में स्वतंत्र रूप से रहते हैं। अन्य परजीवियों के विपरीत, इन्हें जीवित रहने के लिए किसी इंसान या जानवर (Host) के शरीर की आवश्यकता नहीं होती। ये प्रकृति में अपने दम पर जीवित रहने, प्रजनन करने और शिकार करने में सक्षम हैं।
संकट की गंभीरता: जर्नल Biocontaminant में प्रकाशित शोध के अनुसार, अधिकांश अमीबा हानिकारक नहीं होते, लेकिन कुछ प्रजातियां ऐसी हैं जो मानव मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों पर घातक हमला करती हैं। इनकी सबसे डरावनी विशेषता इनकी उत्तरजीविता (Survival) है। ये सूक्ष्मजीव उन परिस्थितियों में भी फल-फूल सकते हैं जो सामान्य बैक्टीरिया और वायरस को मार देती हैं। इनमें अत्यधिक गर्मी सहन करने की क्षमता है और ये क्लोरीन जैसे शक्तिशाली कीटाणुनाशकों (Disinfectants) को भी बेअसर कर देते हैं। 🧬
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3. नायगेलेरिया फाउलरी (Naegleria fowleri): ‘दिमाग खाने वाला’ अमीबा
जब हम फ्री-लिविंग अमीबा की बात करते हैं, तो सबसे घातक नाम आता है—नायगेलेरिया फाउलरी (Naegleria fowleri)। इसे दुनिया भर में ‘ब्रेन-ईटिंग अमीबा’ (Brain-eating amoeba) के नाम से जाना जाता है।
संक्रमण की जैविक प्रक्रिया (Biological Process): यह समझना बेहद जरूरी है कि यह अमीबा आपको केवल पानी पीने से संक्रमित नहीं करता। इसका प्रवेश द्वार आपकी नाक है।
- प्रवेश: जब कोई व्यक्ति संक्रमित पानी में तैरता है, गोता लगाता है या धार्मिक अनुष्ठानों/नाक की सफाई (जैसे नेति पात्र) के दौरान पानी नाक में डालता है, तो यह अमीबा नाक के ऊपरी हिस्से में स्थित ‘घ्राण म्यूकोसा’ (Olfactory mucosa) से चिपक जाता है।
- यात्रा: यहाँ से यह घ्राण तंत्रिका (Olfactory nerve) के साथ एक सफर शुरू करता है। यह तंत्रिका सीधे मस्तिष्क के ‘घ्राण बल्ब’ (Olfactory bulb) से जुड़ी होती है।
- हमला: मस्तिष्क में पहुँचते ही, यह अमीबा वहां के ऊतकों (Tissues) को भोजन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर देता है। इससे मस्तिष्क में भारी सूजन और रक्तस्राव होता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘प्राइमरी अमीबिक मेनिन्गोएन्सेफलाइटिस’ (PAM) कहा जाता है।
सांख्यिकी और गंभीरता: PAM एक दुर्लभ बीमारी है, लेकिन इसकी मृत्यु दर (Fatality rate) 97% से अधिक है। लक्षण दिखने के 5 से 10 दिनों के भीतर मरीज की मृत्यु हो जाती है। यह तथ्य ही इसे दुनिया के सबसे खतरनाक रोगाणुओं की श्रेणी में खड़ा करता है।
विशेषज्ञ का मत: सन यात-सेन विश्वविद्यालय (Sun Yat-sen University) के प्रमुख शोधकर्ता लॉन्गफेई शू (Longfei Shu) कहते हैं, “इन जीवों को जो चीज़ विशेष रूप से खतरनाक बनाती है, वह है उनकी उन परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता जो अन्य रोगाणुओं को मार देती हैं। ये केवल एक मेडिकल समस्या नहीं हैं, बल्कि एक पर्यावरणीय चुनौती भी हैं।”
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4. सुपर-सर्वाइवर: क्लोरीन और गर्मी भी इनके सामने बेअसर क्यों हैं?
हमारी वर्तमान जल शुद्धिकरण प्रणालियाँ (Water treatment systems) 20वीं सदी के मानकों पर आधारित हैं, जहाँ मुख्य ध्यान बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करने पर था। लेकिन फ्री-लिविंग अमीबा ने खुद को ‘सुपर-सर्वाइवर’ के रूप में विकसित कर लिया है।
क्लोरीन प्रतिरोध (Chlorine Resistance): नगर पालिकाओं द्वारा पानी में मिलाया जाने वाला क्लोरीन आमतौर पर बैक्टीरिया की कोशिका झिल्ली को नष्ट कर देता है। हालांकि, अमीबा के पास एक विशेष रक्षा तंत्र होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में, ये स्वयं को एक कठोर आवरण (Cyst) में बदल लेते हैं, जिस पर क्लोरीन का कोई असर नहीं होता।
ताप सहनशीलता और बायोफिल्म (Biofilm): ये जीव 45-46 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में न केवल जीवित रहते हैं, बल्कि तेजी से प्रजनन करते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये हमारी पाइपलाइनों के भीतर एक चिपचिपी परत बना लेते हैं, जिसे ‘बायोफिल्म’ कहा जाता है। इस परत के भीतर छिपे होने के कारण, कोई भी कीटाणुनाशक उन तक नहीं पहुँच पाता। इसका मतलब है कि जिस पानी को आप ‘शुद्ध’ मानकर इस्तेमाल कर रहे हैं, वह पाइपलाइन के भीतर ही संक्रमित हो चुका हो सकता है। 🌡️
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5. अमीबा का ‘ट्रोजन हॉर्स’ प्रभाव (The Trojan Horse Effect)
इतिहास की प्रसिद्ध ‘ट्रोजन हॉर्स’ की कहानी की तरह, जहाँ लकड़ी के घोड़े के भीतर सैनिक छिपे थे, फ्री-लिविंग अमीबा भी अन्य खतरनाक रोगाणुओं के लिए एक ‘सुरक्षित घर’ का काम करते हैं।
खतरनाक बैक्टीरिया का संरक्षण: हालिया शोधों, विशेषकर जनवरी 2023 के अध्ययनों में यह पाया गया है कि लिजियोनेला (Legionella) जैसे बैक्टीरिया, जो घातक निमोनिया (Legionnaires’ disease) का कारण बनते हैं, 41% जल नमूनों में अमीबा के भीतर पाए गए। इसके अलावा, क्लैमिडिया (Chlamydiae) जैसे बैक्टीरिया भी इनके भीतर छिपकर अपनी संख्या बढ़ाते हैं।
यह खतरनाक क्यों है?
- डिसइंफेक्शन से बचाव: जब जल उपचार प्रणालियाँ पानी को साफ करती हैं, तो बाहर तैर रहे बैक्टीरिया मर जाते हैं, लेकिन अमीबा के ‘पेट’ या रिक्तिका (Vacuoles) के भीतर बैठे बैक्टीरिया सुरक्षित बच निकलते हैं।
- हाइपर-विरुलेंस (Hyper-virulence): अमीबा के भीतर रहने के दौरान ये बैक्टीरिया और अधिक शक्तिशाली और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (Antibiotic resistant) हो जाते हैं।
- प्रसार: अमीबा एक वाहन (Vehicle) की तरह इन रोगाणुओं को आपके घर के नल, शॉवर और एयर-कंडीशनिंग सिस्टम तक पहुँचा देता है। 🧬⚠️
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6. तुलनात्मक विश्लेषण: सामान्य रोगाणु बनाम फ्री-लिविंग अमीबा
यह समझने के लिए कि फ्री-लिविंग अमीबा कितने अलग और खतरनाक हैं, नीचे दी गई तालिका देखें:
| विशेषता (Feature) | सामान्य बैक्टीरिया (जैसे E. coli) | फ्री-लिविंग अमीबा (FLA) |
| ऊष्मा सहनशीलता | कम (60°C पर नष्ट) | अत्यधिक उच्च (गर्म झरनों में भी सक्रिय) |
| क्लोरीन प्रतिरोध | कम (जल्द मर जाते हैं) | अत्यधिक प्रतिरोधी (सिस्ट बनाकर बच जाते हैं) |
| रहने का स्थान | मुख्य रूप से सतह या होस्ट | मिट्टी, पानी, पाइपलाइन की बायोफिल्म |
| संक्रमण का मार्ग | भोजन या दूषित पानी (Ingestion) | मुख्य रूप से नाक (Inhalation/Nasal) |
| खतरे का स्तर | दवाओं से इलाज संभव | इलाज अत्यंत कठिन और मृत्यु दर उच्च |
| पहचान की गति | रीयल-टाइम टेस्ट उपलब्ध | धीमी और जटिल प्रयोगशाला प्रक्रिया |
| अन्य जीवों को सुरक्षा | नहीं देते | ‘ट्रोजन हॉर्स’ की तरह काम करते हैं |
व्याख्या: यह डेटा स्पष्ट करता है कि हमारी पारंपरिक जल सुरक्षा दीवारें इन अमीबाओं के लिए किसी मामूली बाधा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इनके बहुआयामी प्रतिरोध के कारण जल प्रबंधन के लिए एक पूरी तरह से नए और आधुनिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
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7. जलवायु परिवर्तन: इस खतरे को हवा देने वाला मुख्य कारक
ग्लोबल वार्मिंग और सूक्ष्मजीवों का आपस में गहरा संबंध है। जैसे-जैसे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है, पानी के स्रोत (झीलें, नदियाँ और यहाँ तक कि भूजल) भी गर्म हो रहे हैं।
क्षेत्रीय प्रसार (Geographical Shift): पहले ‘ब्रेन-ईटिंग’ अमीबा केवल उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों तक सीमित थे। लेकिन अब, शोध बताते हैं कि ये अमेरिका के उत्तरी राज्यों और यूरोप के उन हिस्सों में भी मिल रहे हैं जो पहले बहुत ठंडे माने जाते थे।
हीटवेव का प्रभाव: अगस्त 2024 के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ती ‘हीटवेव’ ने जल निकायों में पोषक तत्वों के स्तर को बदल दिया है, जिससे अमीबा को फलने-फूलने के लिए आदर्श ‘इनक्यूबेशन चैम्बर’ मिल गया है। जब नदियों का बहाव कम होता है और पानी का तापमान बढ़ता है, तो अमीबा की सांद्रता (Concentration) खतरनाक स्तर तक पहुँच जाती है।
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8. जल प्रबंधन की चुनौतियाँ और आधुनिक प्रणालियों की सीमाएं
आज की हमारी जल अवसंरचना (Water Infrastructure) पुरानी हो चुकी है और इस नए जैविक खतरे से निपटने में अक्षम है।
- निगरानी की कमी (Lack of Monitoring): दुनिया के अधिकांश देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, में पानी की गुणवत्ता की जांच केवल बैक्टीरिया (जैसे कोलीफॉर्म) के आधार पर की जाती है। अमीबा के लिए कोई नियमित प्रोटोकॉल नहीं है।
- पहचान की जटिलता: अमीबा की पहचान के लिए उन्नत आणविक परीक्षणों (Molecular tests) की आवश्यकता होती है, जो स्थानीय जल निकायों या नगर पालिकाओं के पास उपलब्ध नहीं हैं।
- तकनीकी बाधाएं: हमारे वर्तमान फिल्टर इतने महीन नहीं हैं कि वे अमीबा या उनके सिस्ट को रोक सकें। साथ ही, पुराने पाइपों में जमा जंग और गंदगी इन जीवों को छिपने के लिए सुरक्षित ठिकाना प्रदान करती है।
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9. ‘वन हेल्थ’ (One Health) रणनीति: समय की मांग
जर्नल Biocontaminant में वैज्ञानिकों ने जिस सबसे महत्वपूर्ण समाधान की वकालत की है, वह है ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण।
क्या है यह रणनीति? इसका मूल विचार यह है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण स्वास्थ्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं।
- एकीकृत निगरानी: केवल अस्पतालों में मरीजों का इलाज करना काफी नहीं है। हमें जल वितरण प्रणालियों में रीयल-टाइम सेंसर लगाने होंगे जो अमीबा की उपस्थिति का पता लगा सकें।
- सilos को तोड़ना: वर्तमान में, जल इंजीनियर और डॉक्टर अलग-अलग काम करते हैं। ‘वन हेल्थ’ के तहत, जल प्रबंधन विभागों को सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर डेटा साझा करना होगा।
- उन्नत उपचार: शोधकर्ता अब ‘अल्ट्रा-वायलेट (UV) रेडिएशन’ और ‘ओजोन ट्रीटमेंट’ जैसी तकनीकों के उपयोग पर जोर दे रहे हैं, जो अमीबा के कठोर बाहरी कवच (Cyst) को तोड़ने में सक्षम हैं।
लॉन्गफेई शू के शब्दों में, “हमें समस्या को उसके स्रोत (Source) पर ही रोकना होगा, इससे पहले कि वह एक संक्रमण का रूप ले ले।”
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10. सुरक्षा के उपाय: हम खुद को कैसे बचा सकते हैं?
खतरा गंभीर है, लेकिन डरने के बजाय जागरूक होना बचाव की पहली सीढ़ी है। यहाँ कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं:
- तैराकी के दौरान सावधानी: ताजे पानी की झीलों, तालाबों या गर्म पानी के सोतों में तैरते समय हमेशा नोज प्लग (Nose plugs) का उपयोग करें। कोशिश करें कि आपका सिर पानी के नीचे न जाए।
- घर पर जल सुरक्षा: यदि आप साइनस की सफाई या ‘नेति पात्र’ का उपयोग करते हैं, तो कभी भी नल के पानी का सीधा उपयोग न करें। केवल उबला हुआ (कम से कम 1 मिनट तक उबला), डिस्टिल्ड या स्टेराइल पानी ही इस्तेमाल करें।
- ओवरहेड टैंक की सफाई: अपने घर की पानी की टंकियों को नियमित रूप से साफ करें और सुनिश्चित करें कि उनमें बायोफिल्म या गंदगी न जमा हो।
- लक्षणों को न पहचानें: यदि तैरने के बाद तेज सिरदर्द, अचानक बुखार, गर्दन में अकड़न या मतिभ्रम (Confusion) जैसे लक्षण महसूस हों, तो इसे सामान्य सर्दी न समझें और तुरंत डॉक्टर को बताएं कि आप हाल ही में पानी के संपर्क में आए थे। ⚠️
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11. वैज्ञानिक अनुसंधान और भविष्य की राह
भविष्य की जंग प्रयोगशालाओं में लड़ी जा रही है। Shenyang Agricultural University और अन्य संस्थान अब ‘रैपिड डायग्नोस्टिक किट्स’ विकसित कर रहे हैं।
- DNA आधारित पहचान: वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो पानी के नमूने से सीधे अमीबा के DNA को पहचान सकती है।
- भविष्य का पूर्वानुमान: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके यह अनुमान लगाने की कोशिश की जा रही है कि वैश्विक तापमान में कितनी वृद्धि होने पर किस क्षेत्र में अमीबा का प्रसार सबसे अधिक होगा।
ग्लोबल वार्मिंग के इस युग में, हमारी स्वास्थ्य प्रणालियों को प्रतिक्रियाशील (Reactive) होने के बजाय सक्रिय (Proactive) होना होगा।
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12. वैश्विक प्रभाव: क्या भारत जैसे देश भी खतरे में हैं?
भारत के संदर्भ में यह खतरा अत्यंत प्रासंगिक है। हमारी गर्म जलवायु, मॉनसून के दौरान होने वाली जल-जमाव की समस्याएं और सार्वजनिक जल निकायों (जैसे कुएं, बावड़ी और नदियाँ) पर हमारी निर्भरता हमें एक ‘हाई-रिस्क’ जोन में रखती है।
- स्थानीय जल निकाय: भारत में कई लोग अभी भी स्नान और दैनिक कार्यों के लिए तालाबों और नदियों का उपयोग करते हैं। गर्मियों में इन जल निकायों का तापमान 35-40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जो Naegleria fowleri के लिए स्वर्ग जैसा है।
- नगर पालिका की सीमाएं: भारत के अधिकांश शहरों में जल पाइपलाइनें दशकों पुरानी हैं, जिनमें लीकेज और बायोफिल्म की समस्या आम है। यह ‘ट्रोजन हॉर्स’ बैक्टीरिया के लिए एक सुरक्षित गलियारा प्रदान करता है।
- जन जागरूकता: भारत में ‘ब्रेन-ईटिंग अमीबा’ के बारे में जागरूकता लगभग शून्य है। स्थानीय स्वास्थ्य विभागों को चाहिए कि वे तैराकी वाले क्षेत्रों के पास चेतावनी बोर्ड लगाएं और जल उपचार में आधुनिक मानकों को अपनाएं।
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13. निष्कर्ष: जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है
‘ब्रेन-ईटिंग’ अमीबा और फ्री-लिविंग अमीबा का उदय इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति के सबसे छोटे जीव भी मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं। यह समस्या केवल पानी की नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के प्रति हमारे दृष्टिकोण की भी है। जलवायु परिवर्तन और पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर मिलकर एक ऐसा ‘साइलेंट किलर’ तैयार कर रहे हैं जिसे नजरअंदाज करना घातक हो सकता है।
अंत में, यह सवाल हर नागरिक और नीति निर्माता के लिए है: “क्या हम अपनी सबसे बुनियादी जरूरत—पानी—की सुरक्षा के प्रति पर्याप्त सजग हैं?” हमारी आज की सतर्कता ही कल की पीढ़ी को इन अदृश्य शिकारियों से बचा पाएगी। 💧🤔
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14. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: क्या पीने के पानी से भी ‘ब्रेन-ईटिंग’ अमीबा का संक्रमण हो सकता है? उत्तर: नहीं। अगर आप संक्रमित पानी पीते हैं, तो आपके पेट का एसिड (Gastric acid) अमीबा को मार देता है। संक्रमण केवल तभी होता है जब पानी नाक के रास्ते सीधे घ्राण तंत्रिका तक पहुँचे।
प्रश्न 2: क्या घर में पानी उबालना इन अमीबाओं को मारने के लिए पर्याप्त है? उत्तर: हाँ, पानी को कम से कम एक मिनट तक रोलिंग बॉयल (तेजी से उबालना) करना अमीबा और उनके प्रतिरोधी सिस्ट को मारने का सबसे प्रभावी तरीका है।
प्रश्न 3: क्या यह संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है? उत्तर: नहीं, Naegleria fowleri का संक्रमण संक्रामक नहीं है। यह छुआछूत से नहीं फैलता।
प्रश्न 4: क्या क्लोरीनयुक्त स्विमिंग पूल पूरी तरह सुरक्षित हैं? उत्तर: हमेशा नहीं। अगर पूल का क्लोरीन स्तर सही ढंग से मेंटेन नहीं किया गया है, तो ये अमीबा जीवित रह सकते हैं। केवल वही पूल सुरक्षित हैं जहाँ कीटाणुशोधन के कड़े मानकों का पालन किया जाता है।
प्रश्न 5: संक्रमण के लक्षण कितने समय बाद दिखाई देते हैं? उत्तर: लक्षण आमतौर पर संक्रमित पानी के संपर्क में आने के 2 से 15 दिनों के भीतर दिखाई देते हैं। शुरुआती लक्षणों में तेज सिरदर्द, बुखार और उल्टी शामिल हैं, जो बाद में गंभीर दिमागी विकारों में बदल जाते हैं।
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Senior Health Journalist & Digital Content Strategist के द्वारा जनहित में जारी। #BrainEatingAmoeba #NaegleriaFowleri #WaterSafety #ClimateChange #HealthAlert
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